CRPC 1973 परिवाद (complaint)

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 2 ( d ) में परिवाद को परिभाषित किया गया है |

जिसके अनुसार , “ परिवाद ‘ मजिस्ट्रेट द्वारा कार्यवाही किये जाने की दृष्टि से मौखिक या लिखित रूप से उससे किया गया यह अभिकथन अभिप्रेत है कि किसी व्यक्ति ने , चाहे यह ज्ञात हो या अज्ञात , अपराध किया है ,

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CRPC 1973 जानिए आरोप किसे कहते हैं एवं विचारणीय न्यायालय द्वारा आरोप में परिवर्तन कब किया जा सकता है ?

दण्ड प्रक्रिया संहिता , 1973 , में आरोप को परिभाषित नहीं किया गया है । सामान्य अर्थ में , आरोप , अभियुक्त को उसके विरूद्ध अपराध की जानकारी देने का लिखित कथन है ।

इसमें न्यायालय का नाम , प्रकरण संख्या व सन् , प्रकरण का उनवान ( टाइटल ) , अपराध की दिनांक , समय व स्थान , आरोप के आधार व करने की रीति , अपराध का नाम व विधिक धाराओं का उल्लेख होता है ।

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IPC 1860 आपराधिक अभित्रास ( Criminal Intimidation )

भारतीय दंड संहिता की धारा धारा 503 आपराधिक अभित्रास ( Criminal Intimidation ) के बारे में बात करती है |

धारा 503 के अध्ययन से आपराधिक अभित्रास के निम्नलिखित अवयव प्राप्त होते हैं –

1- किसी व्यक्ति को क्षति कारित करने की धमकी देना तथा ऐसी धमकी –

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IPC 1860 एकांत परिरोध ( Solitary Confinement )

धारा 73. एकांत परिरोध ( Solitary Confinement ) एकांत परिरोध में अभियुक्त को बाहरी दुनिया से पूर्णतः अलग थलग ऐसे स्थान में रखा जाता है जहाँ उससे किसी अन्य का संपर्क न हो सके |

इस दण्ड का मूल उद्देश्य अभियुक्त को पश्चाताप करने का अवसर प्रदान करना है ।

एकांत परिरोध के लिए आवश्यक शर्ते –

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CRPC 1973 संक्षिप्त विचारण (समरी ट्रायल)

➡️ सभी प्रकार के विचारण अपराध की गंभीरता के अनुसार न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए जाते है । जिस प्रकार की गंभीरता का अपराध होता है, उस प्रकार का विचारण किया जाता है।

➡️ यदि मामला विरल होता है तथा गंभीर प्रकृति का होता है तो ऐसे मामले में अनुभव रखने वाले न्यायाधीश के माध्यम से विचारण आवश्यक होता है।

➡️ ऐसे गंभीर मामलों में संक्षिप्त विचारण का प्रावधान रखा गया है।

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