IPC 1860 व्यपहरण एवं अपहरण Kidnapping and Abduction

🛑 धारा 359 ( भारतीय दण्ड संहिता ) में व्यपहरण दो प्रकार का बताया गया है ।

प्रथम – भारत से व्यपहरण ( Kidnapping from India )

द्वितीय – विधिक संरक्षण से व्यपहरण ( Kidnapping from Lawful Guardianship )

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 360 में भारत से व्यपहरण को परिभाषित किया गया है , जो ज्यादा उपयोग में नहीं आता । भारत के स्वतन्त्र होने से पूर्व ब्रिटिश शासन में इसका उपयोग होता था , परन्तु अब नहीं ।

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CRPC 1973 अनियमित कार्यवाही Irregular Proceedings क्या होती है ?

कभी-कभी दाण्डिक प्रक्रिया के अंतर्गत दंड न्यायालय अपनी शक्तियों के बाहर जाकर कोई काम करता है। जब दंड न्यायालय अपनी शक्तियों के बाहर जाकर कोई कार्यवाही करता है ऐसी कार्यवाही को अनियमित कार्यवाही (Irregular Proceedings) कहा जाता है।

साधारण अर्थों में ऐसी कार्यवाही, जिसे करने के लिए कोई दंड न्यायालय सशक्त नहीं है उसके उपरांत भी उन कार्यवाहियों को कर देता है।

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TP ACT 1882 कहावत “ जो व्यक्ति समय के क्रम में पहले आता है वही कानून में मजबूत है । पढ़िए व्याख्यात्मक विश्लेषण

जो व्यक्ति समय के क्रम में पहले आता है वही कानून में मजबूत है –

इस कहावत का तात्पर्य यह है कि –

“ जब एक ही सम्पत्ति का दो बार बन्धक द्वारा अन्तरण किया जाता है तो बाद वाला अन्तरण पहले की अपेक्षा छोड़ देना चाहिए । ”

पहला बन्धकदार , यदि आवश्यक हो तो दूसरे को बहिष्कृत कर , सम्पत्ति में से संतुष्ट होने का हकदार है

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CPC 1908 जानिए किन परिस्थितियों में द्वितीय अपील में उच्च न्यायालय “तथ्य के प्रश्न” का अवधारण कर सकता है ?

CPC की धारा 100 के अनुसार द्वितीय अपील का दायरा , प्रथम अपील के दायरे से काफी कम है ।

द्वितीय अपील विधि अथवा प्रक्रिया सम्बन्धी भूल के आधार पर लायी जाती है न कि अधीनस्थ न्यायालय द्वारा दिये गये तथ्य के निष्कर्षों की त्रुटि के आधार पर ।

👉 तथ्य के निष्कर्षों की त्रुटि , प्रक्रिया में त्रुटि से भिन्न है ।

लेकिन यह स्थिति संशोधन अधिनियम , 1976 द्वारा बदल दी गयी है । अब धारा 103 के पुनर्स्थापित करने के पश्चात् यह स्पष्ट कर दिया गया है कि तथ्य का वाद बिन्दु द्वितीय अपील में तय किया जा सकता है ।

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INDIAN EVIDENCE ACT 1872 जानिए कब न्यायाधीश सक्षम साक्षी हो सकता है ? और किन तथ्यों के बारे में साक्ष्य दे सकता है

कोई भी न्यायाधीश एक सक्षम साक्षी होता है और वह उन सब तथ्यों के बारे में साक्ष्य दे सकता है , जो उसकी उपस्थिति में हुई हो ,

👉 पर उन्हें उन प्रश्नों का उत्तर देने के लिए विवश नहीं किया जा सकता , जो उनके मजिस्ट्रेट या न्यायाधीश की हैसियत से किये गये आचरण से सम्बन्ध रखता है ।

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