[ IEA 1872 ] “परिस्थितियां स्वयं बोलती हैं” विभिन्न न्यायिक निर्णयों के साथ एक विस्तृत विश्लेषण

उपेक्षा अथवा असावधानी के सम्बन्ध में यह एक महत्वपूर्ण नियम या सिद्धांत है ! इसे “घटना स्वयं प्रमाण है” अथवा “चीज स्वयं बोलती है” का नियम या सिद्धांत भी कहा जाता है ! 

सामान्य नियम यह है कि घटना के लिए प्रतिवादी की उपेक्षा अथवा लापरवाही को साबित करने का भार स्वयं वादी पर होता है !

ऐसे मामलों में प्रतिवादी को यह साबित करना होता है कि उसने कोई लापरवाही नहीं बरती है ! लेकिन यह कोई निरपेक्ष नियम नहीं है अर्थात् वादी के लिए यह सम्भव नहीं होता कि प्रतिवादी की उपेक्षा को साबित कर सके !

कई बार घटनाओं की प्रकृति ऐसी होती है कि वादी यह तो साबित कर सकता है कि घटना हुई है लेकिन यह साबित नहीं कर सकता कि किसकी लापरवाही या उपेक्षा की वजह से कारित हुई है !

उदाहरण –

वादी एक सड़क पर जा रहा था तथा जब वह प्रतिवादी की दुकान के निकट से गुजरा तो एक आटे का कनस्टर दुकान की ऊपरी मंजिल से वादी के सर पर आकर गिरा और वह घायल हो गया !

वादी यह नहीं बता सकता कि घटना किस प्रकार घटी लेकिन यह अवश्य बता सकता था कि जब वह प्रतिवादी की दुकान के निकट से गुजरा तभी दुकान की ऊपरी मंजिल से कनस्टर उसके ऊपर गिरा जिससे वह बेहोश हो गया !

ऐसे मामलों में शेष सारी बातें अर्थात् घटना कैसे घटी, यह परिस्थितियां स्वयं बता देती हैं !

परिस्थितियां इस बात का प्रमाण हैं कि कनस्टर असावधानपूर्वक खिड़की से बाहर निकाल कर रखा हुआ था जिससे वह वादी के ऊपर गिरा ! कनस्टर स्वयं खिड़की से बाहर नहीं गिर सकता !

यही “परिस्थितियां स्वयं बोलती हैं” का सिद्धांत है ! 

👉 इस सम्बन्ध में पोलक का कहना है कि ऐसे मामलों में यदि वादी से यह अपेक्षा की जाये कि कनस्टर कैसे गिरा, किसने गिराया को साबित करे तो यह मूर्खतापूर्ण बात होगी !

सरल शब्दों में यह कहा जा सकता है कि वादी से यह कहा जाये कि वह खिड़की से कनस्टर गिराने वाले को साक्षी के तौर पर बुलाकर उससे उसकी उपेक्षा को साबित करें, यह बात मूर्खतापूर्ण होगी !

ऐसे मामलों में प्रतिवादी की लापरवाही स्वयं सिद्ध हो जाती है !

👉 कुछ महत्वपूर्ण निर्णय

पुष्पा बाई पुरुषोत्तम उडेसी बनाम मे.रणजीत जीनिंग एण्ड प्रेसिंग क.प्रा.लि. एआईआर 1977 एस.सी. 1735 के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा यह कहा गया है कि उपेक्षा और उतावलेपन से वाहन चलाये जाने के मामले में प्रतिवादी को यह साबित करना होता है कि उसके द्वारा वाहन उपेक्षा और उतावलेपन से नहीं चलाया गया था !

ऐसे मामलों में “परिस्थितियां स्वयं बोलती हैं” का सिद्धांत लागू होता है !

इस मामले में प्रतिवादी के वाहन में यात्रा करते समय पुरोषोत्तम की मृत्यु हो गई थी ! वाहन प्रतिवादी कम्पनी का मैनेजर चला रहा था ! वाहन अत्यन्त तेज गति, उपेक्षा और उतावलेपन से चलाया जा रहा था !

न्यायालय ने “परिस्थितियां स्वयं बोलती हैं” का सिद्धांत लागू करते हुए प्रतिवादी को उपेक्षा का दोषी ठहराया !

स्टेट अॉफ केरल बनाम वी.वी.चार्ज एआईआर 2017 एन.ओ.सी. 1101 केरल के मामले में जंगली जानवरों द्वारा वादी के पुराने नारियल और रबड़ के पेड़ों को नष्ट कर दिया गया ! वादी एवं आरक्षित वन के बीच कोई फेन्सिंग की हुई नहीं थी !

न्यायालय ने राज्य को यह कहते हुए उत्तरदायी ठहराया कि “घटना स्वयं बोलती है” !

बिहार स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन बनाम मंजू एआईआर 1992 पटना 109 के मामले में पटना उच्च न्यायालय द्वारा यह निर्धारित किया गया है कि कि “परिस्थितियां स्वयं बोलती हैं” के सिद्धांत में प्रतिवादी को यह साबित करना होता है कि घटना उसकी उपेक्षा या लापरवाही से कारित नहीं हुई है !

वादी को केवल यह साबित करना होता है कि घटना कारित हुई है ! इस मामले में वादी एक रिक्शे में बैठकर जा रहा था ! पीछे से बिहार स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन की बस ने उस रिक्शे को इतनी जोर से टक्कर मारी कि वादी रिक्शे से गिरकर 10 फीट दूर जाकर गिरा !

इसमें न्यायालय ने “परिस्थितियां स्वयं बोलती हैं” के सिद्धांत के अनुसार प्रतिवादी को दोषी ठहराया ! 

वी.के. साहेब बनाम मैसूर स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन एआईआर 1991 ए.सी. 487 के मामले में वादी (अपीलार्थी) प्रतिवादी (प्रत्यर्थी) की बस में यात्रा कर रहा था तब दुर्घटनाग्रस्त हो गया ! दुर्घटना के समय सड़क पर ना तो भीड़ थी और ना ही वाहन में कोई यांत्रिक त्रुटि आ गई थी !

न्यायालय ने इसमें “परिस्थितियां स्वयं बोलती हैं” के सिद्धांत को लागू करते हुए कहा घटना के औचित्य को साबित करने का भार प्रतिवादी पर है !

 श्याम सुन्दर बनाम स्टेट अॉफ राजस्थान एआईआर 1974 एस.सी. 890 के मामले में वादी राजस्थान सरकार के अधीन सार्वजनिक निर्माण विभाग में स्टोर कीपर के पद पर कार्यरत था ! एक दिन वह सूखा पीड़ित लोगों के लिए राहत सामग्री लेकर एक ट्रक से जा रहा था ! ट्रक का रेडियेटर बार-बार गरम हो जाता था तथा हर 6-7 मील के बाद चालक को उसमे पानी डालना पड़ता था !

अन्तत: उसमें आग लग गई ! इस पर जब वादी आग से बचने के लिए वाहन से कूदा तो एक पत्थर से टकरा गया जिससे उसकी मृत्यु हो गई !

वादी की विधवा ने नुकसानी का वाद संस्थित किया ! वादी का वाद स्वीकार करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि घटना चालक की उपेक्षा के कारण कारित हुई थी ! जब रेडियेटर बार-बार गरम हो रहा था तो चालक को विशेष सावधानी बरतनी चाहिये थी और विशेष उपाय करने चाहिये थे लेकिन नहीं किये गये !

ऐसे मामलों में “परिस्थितियां स्वयं बोलती हैं” का सिद्धांत लागू होता है ! वादी के लिए यह आवश्यक नहीं है कि प्रतिवादी की उपेक्षा को साबित करें ! 

श्रीमती रुक्मणिदास बनाम स्टेट अॉफ ओडिशा एआईआर 2014 एन.ओ.सी. 836 के मामले में यह निर्धारित किया गया है कि घटना स्वयं बोलती है का सिद्धांत ऐसे मामलों में लागू नहीं होता जिनमें लापरवाही नहीं पाई गई हो !

पदमबिहारीलाल बनाम उड़ीसा इलेक्ट्रिक बोर्ड एआईआर 1992 उड़ीसा 68 के मामले में याचिकादाता का पुत्र साइकिल से बाजार जा रहा था तो बिजली के लटके हुए तारों के सम्पर्क में आने से उसकी मृत्यु हो गई!

न्यायालय ने कहा – बिजली के खंभों से नंगे तार लटकना “परिस्थितियां स्वयं बोलती हैं” के सिद्धांत को लागू करने के लिए पर्याप्त है ! ऐसे मामलों में प्रतिवादी को यह साबित करना होता है कि वह उपेक्षा का दोषी नहीं है ! 

मध्यप्रदेश विधुत बोर्ड, रामपुर बनाम भजन गोन्डा एआईआर 1999 मध्यप्रदेश 17 के मामले में बिजली के कुछ तार खम्भे से टूटकर खेत में गिर गये थे जिससे एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई ! इसमें न्यायालय द्वारा “परिस्थितियां स्वयं बोलती हैं” के सिद्धांत को लागू करते हुए प्रतिवादी को घटना के लिए दोषी ठहराया !

ऐसे मामलों में आवश्यक नहीं है कि वादी प्रतिवादी की उपेक्षा को साबित करें ! अपनी उपेक्षा नहीं होने के तथ्य को साबित करने का भार प्रतिवादी पर होता है ! 

 चीफ एक्जीक्यूटिव अॉफिसर बनाम प्रभाती साहू एआईआर 2012 एन.ओ.सी. 83 उड़ीसा के मामले में “परिस्थितियां स्वयं बोलती हैं” के सिद्धांत को लागू किया गया ! इसमें कुछ ही ऊंचाई पर लटकते हुए बिजली के तारों के सम्पर्क में आने से मृतक की मृत्यु हो गई थी !

घटनास्थल पर ऐसा कोई संकेत नहीं था जो यह बता सके कि बिजली का सप्लाई बन्द है ! यह उपेक्षा थी! यदि ऐसी उपेक्षा नहीं बरती जाती तो घटना टल सकती थी !

इसे विधुत प्राधिकारी की लापरवाही और उपेक्षा मानते हुए मृतक के वारिसों को प्रतिकर पाने का हकदार माना गया ! 

ऐसे और भी अनेक मामले हैं जिनमें न्यायालय द्वारा “परिस्थितियां स्वयं बोलती हैं” के सिद्धांत को लागू किया गया ! इस सिद्धांत का मूल अभिप्राय यह है कि –

    1- घटना अथवा परिस्थितियां स्वयं बोलती अर्थात् वे स्वयं यह स्पष्ट कर देती हैं कि घटना कैसे कारित हुई,

    2- ऐसे मामलों में वादी के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह प्रतिवादी की उपेक्षा को साबित करे,

    3- यह साबित करने का भार कि घटना के कारित होने में प्रतिवादी की कोई उपेक्षा नहीं रही है, स्वयं प्रतिवादी पर होता है !

श्रीमती मधुबाला बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली एआईआर 2005 एन.ओ.सी. 339 दिल्ली के मामले में एक महिला की शल्य चिकित्सा कराई गई ताकि उसके आगे कोई संतान नहीं हो ! शल्य चिकित्सा के बाद भी चिकित्सकों द्वारा यह स्पष्ट कर दिया गया था कि शल्य चिकित्सा के बाद भी संतान हो सकती है !

महिला को भी यह हिदायत दी गई थी कि मासिक धर्म नियमित नहीं होने पर वह समय-समय पर अपनी जांच कराती रहे ! लेकिन महिला ने कोई ध्यान नहीं दिया ! शल्य चिकित्सा के बाद भी महिला ने बच्चे को जन्म दे दिया !

उसके बाद चिकित्सकों के विरुद्ध लापरवाही का वाद दायर किया गया ! महिला ने सबूत में “परिस्थितियां स्वयं बोलती हैं” के सूत्र का सहारा लिया, लेकिन न्यायालय ने इस मामले में इस सूत्र को लागू नहीं माना, क्योंकि महिला स्वयं लापरवाही की दोषी थी !